प्रदेश में औद्यानिक क्लस्टर उत्पादन क्षेत्र/प्रसंस्करण क्षेत्र का मानकीकरण — इसमें निर्यात मात्रा, निर्यात गंतव्य, निर्यात किए जाने वाले औद्यानिक उपज एवं उत्पादों की पहचान तथा लक्षित निर्यात बाजारों में अतिरिक्त अवसरों की खोज शामिल होगी।
बुनियादी ढाँचा एवं लॉजिस्टिक मानकों का प्रवर्तन।
बागवानों, बागवान उत्पादक संस्थाओं तथा प्रसंस्करणकर्ताओं को निर्यात मूल्य श्रृंखला से जोड़ने हेतु उन्हें निर्यात प्रक्रियाओं, लाइसेंस, प्रमाणीकरण आदि की जानकारी एवं प्रशिक्षण प्रदान कर क्षमता निर्माण।
बागवानों, उत्पादक संस्थाओं, प्रसंस्करणकर्ताओं एवं अन्य हितधारकों को निर्यात के सर्वोत्तम गंतव्यों का भ्रमण कराकर क्षमता निर्माण।
प्रदेश के बागवानी उपज एवं प्रसंस्कृत उत्पादों का ब्रांडिंग कर उनकी वैश्विक पहचान स्थापित करना।
प्रदेश के बागवानी उपज एवं प्रसंस्कृत उत्पादों की अंतर्राष्ट्रीय स्वीकार्यता हेतु गुड एग्रीकल्चरल प्रैक्टिसेज (GAP) व संबंधित प्रमाणन को प्रोत्साहित करना।
दीर्घकालिक निर्यात बढ़ाने हेतु वैश्विक मानकों/फूड सेफ्टी सिस्टम्स को अपनाने के लिए कृषकों को प्रोत्साहित करना — इसमें आम, अमरूद, केला, स्ट्रॉबेरी, ब्लूबेरी तथा सब्जियां विशेष रूप से शामिल हैं ताकि कम लागत में अधिक उत्पादन व बढ़ी हुई आय सुनिश्चित हो सके।
अंतर्राष्ट्रीय मांग के अनुरूप निर्यात हेतु आवश्यक बीज एवं अन्य इनपुट का समुचित आयात सुनिश्चित करना।
प्रदेश के बागवानी उपज एवं प्रसंस्कृत उत्पादों के वैश्विक अवसरों की जानकारी किसानों तक पहुँचाने के लिए डिजिटल माध्यम एवं सूचना-शिक्षा-संचार (IEC) सामग्री का प्रयोग।
ताजे फलों एवं सब्जियों के निर्यात हेतु रोग एवं कीट-मुक्त क्षेत्र तथा लंबी दूरी के समुद्री/लॉजिस्टिक्स प्रोटोकॉल के विकास हेतु अनुसंधान संस्थानों और विश्वविद्यालयों के साथ समन्वय।
विदेश व्यापार नीति-2023 के अंतर्गत निर्यात प्रदर्शन के आधार पर, 'मलिहाबाद' की तर्ज पर अनेक बागवानी "Town of Export Excellence" विकसित करना तथा केन्द्र/राज्य की प्रासंगिक योजनाओं का लाभ सुलभ कराना।
चुनौतियां
औद्यानिक उपजों की सेल्फ लाइफ कम होने के कारण ये पेरिशेबल श्रेणी में आते हैं।
RFRAC, लखनऊ में उपलब्ध मशीनें 15–16 वर्ष पुरानी हैं तथा गुणवत्ता परीक्षण हेतु
आवश्यक सभी मशीनें उपलब्ध नहीं हैं। इससे केवल लगभग 80% कीटनाशक अवशेष
(Pesticide Residues) का ही परीक्षण संभव है।
निजी प्रयोगशालाओं पर निर्भरता के कारण समय पर परीक्षण नहीं हो पाता और उत्पाद
प्रतीक्षा के दौरान खराब होकर निर्यात-अनुपयुक्त हो जाते हैं।
वैक्यूम स्किन पैकेजिंग, Modified Atmosphere Packaging, Hot Water Treatment
(65°C) जैसी अत्याधुनिक तकनीकों के उपयोग की जानकारी का अभाव होने से
उत्पादक इन तकनीकों का लाभ नहीं उठा पा रहे हैं।
फलों एवं सब्जियों के लिए समर्पित Chambers of Commerce का अभाव — अनाज,
मसाला, दलहन, तिलहन आदि फसलों हेतु कई चैम्बर्स उपलब्ध हैं, परन्तु
horticulture सेक्टर के लिए न होने से हितधारकों को निर्यात सम्बंधी
मार्गदर्शन नहीं मिल पाता।
भारत सरकार एवं उत्तर प्रदेश सरकार की निर्यात-प्रोत्साहन योजनाओं,
छूटों एवं सब्सिडी की पर्याप्त जानकारी न होने से निर्यात वृद्धि बाधित होती है।
लघु खाद्य आपूर्ति श्रृंखला (Short Food Supply Chain — SFSC) का पूर्ण रूप से
विकसित व संचालित न होना।